शिवभक्त भोलेनाथ को इस बार नहीं कर पाएंगे स्पर्श, पढ़ें काशीपुर के प्राचीन मोटेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास

उत्तराखंड भक्ति

पौराणिक नगर काशीपुर में कई प्राचीन देवालय हैं। इसमें प्रमुख रूप से प्राचीन मोटेश्वर महादेव मंदिर द्वादश उपज्योर्तिलिंग भी शामिल है। यहां प्रत्येक वर्ष श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर दूर-दूर से शिवभक्त पूजा-अर्चना करने आते हैं।

लेकिन इस वर्ष कोरोना संक्रमण के चलते शिवभक्त अपने अराध्य देव को स्पर्श नहीं कर पाएंगे। जलाभिषेक गर्भगृह के बाहर स्थापित कलश में चढ़ाएंगे जो शिवलिंग तक पहुंच जायेगा।

इस वर्ष श्रावण मास कोरोना संक्रमण के बीच होने से मंदिरों के प्रबंधक कोविड-19 के दिशा-निर्देशों के मुताबिक पूजा-अर्चना करा रहे हैं।  

पुजारी राघवेंद्र नागर ने कहा श्रद्धालु इस बार मंदिर प्रबंधन ने विकल्प के रूप में गर्भगृह के बाहर दो कलश एक तांबे और दूसरा स्टील का लगाया है। जिसको शिवलिंग से जोड़ा गया है। शिवभक्त कलश में जल चढ़ाएंगे तो वह सीधे शिवलिंग पर जाकर चढ़ेगा।प्रसाद आदि सेवादार को दिया जाएगा।

हजारों वर्ष पुराना है मोटेश्वर का इतिहास
प्राचीन मोटेश्वर महादेव मंदिर का हजारों वर्ष पुराना इतिहास है। किवंदतियां हैं अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां रुके थे। भीम ने इस मंदिर की स्थापना की थी। पुजारी राघवेंद्र नागर ने कहा मंदिर का जीर्णोद्धार वर्ष 1980 में मूल प्रकाश पुत्र रामप्रकाश सर्राफ ने कराया था। 

प्रत्येक वर्ष चढ़ती हैं हजारों कांवड़
प्राचीन मोटेश्वर महादेव मंदिर में प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि पर्व व श्रावण मास में दूरदराज से शिवभक्त हरिद्वार से गंगाजल लाकर कांवड़ चढ़ाते हैं।लेकिन इस बार शिवभक्त शासन-प्रशासन द्वारा हरिद्वार से गंगाजल लाने पर प्रतिबंध लगाने से कांवड़ भी नहीं लगा सकेंगे। 

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